
Dwarka ka Nagari Rahasya
आज के इस लेख में हम आपको dwarka nagari ka rahasya के बारे में बताने वाले है की भारतीय पौराणिक कथाओं और इतिहास का एक प्रमुख विषय है। द्वारका भगवान श्रीकृष्ण की नगरी मानी जाती है, जिसे उन्होंने मथुरा छोड़ने के बाद द्वारका गोमती नदी और अरब सागर के किनारे ओखामण्डल प्रायद्वीप तट पर बसा हुआ है। यहाँ हिन्दीओ के चारधाम में एक है। इसे प्राचीन राज्य स्थली गुजरात के राजधानी माना जाता है और यहाँ गुजरात के समुद्र किनारे बसा है।
डूबती नगरी: माना जाता है कि श्रीकृष्ण के स्वर्गारोहण के बाद द्वारका समुद्र में डूब गई थी।
प्राचीन अवशेष: 1980 के दशक में समुद्र के नीचे पुरातात्विक खुदाई में द्वारका के प्राचीन अवशेष मिले, जो इसकी प्राचीनता और महत्ता को सिद्ध करते हैं।
पौराणिक मान्यता: महाभारत और पुराणों में इसका उल्लेख “सात द्वारका” के रूप में किया गया है।
विज्ञान और इतिहास: वैज्ञानिक शोध इसे 9000 साल पुरानी सभ्यता से जोड़ते हैं।
यह स्थान धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अद्वितीय माना जाता है।
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Dwarka Nagari के पीछे की कहानी
द्वारका नगरी की कहानी भारतीय पौराणिक कथाओं से जुड़ी है, जो भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और उनके महान कार्यों को दर्शाती है। यह कहानी धर्म, वास्तुकला और आध्यात्मिकता का संगम है।
द्वारका नगरी की कहानी:
मथुरा से द्वारका नगरी कंस वध के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा छोड़ दी, क्योंकि जरासंध बार-बार मथुरा पर हमला कर रहा था। अपने लोगों की सुरक्षा के लिए उन्होंने समुद्र के किनारे एक नई नगरी बसाई, जिसे द्वारका नाम दिया गया। माना जाता है कि यह नगरी वास्तुकला का अद्भुत नमूना थी। इसमें 70000 महल थे, जिनमें स्वर्ण, चांदी, और अन्य कीमती धातुओं का उपयोग किया गया था। इसे विश्वकर्मा द्वारा बनाया गया बताया जाता है।
नगरी का अंत श्रीकृष्ण के स्वर्गवास के बाद द्वारका समुद्र में समा गई। यह घटना पौराणिक ग्रंथों में भी दर्ज है।
Dwarka Nagari की स्थापना कैसे हुई
द्वारका नगरी की स्थापना भगवान श्रीकृष्ण द्वारा मथुरा छोड़ने के बाद की गई थी। इसकी स्थापना के पीछे एक रणनीतिक और दैवीय उद्देश्य था।
मथुरा पर खतरा:-
कंस वध के बाद मथुरा पर कंस के ससुर जरासंध ने 17 बार आक्रमण किया। श्रीकृष्ण ने महसूस किया कि मथुरा में रहकर अपने लोगों को इन हमलों से सुरक्षित रखना मुश्किल होगा और मथुरा के नागरिक इन आक्रमणों से परेशान हो गए थे। भगवान श्रीकृष्ण ने महसूस किया कि जरासंध से लड़ने के बजाय अपने लोगों को सुरक्षित स्थान पर ले जाना अधिक उचित होगा।
समुद्र के किनारे नई नगरी का निर्माण:-
श्रीकृष्ण ने अपने लोगों के लिए एक सुरक्षित स्थान की तलाश की और समुद्र के किनारे एक नई नगरी बसाने का निश्चय किया। इसमें मुख्य द्वार (दरवाजे) थे, जो इसे “द्वारका” नाम देते थे। यह नगरी सात द्वारों से घिरी हुई थी, जो इसे अत्यंत सुरक्षित बनाते थे।
भव्य नगरी का निर्माण:-
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, देवताओं के शिल्पकार विश्वकर्मा ने श्रीकृष्ण के आदेश पर द्वारका का निर्माण किया। यह नगरी अद्वितीय वास्तुकला और भव्यता का प्रतीक थी। द्वारका में 70000 महल थे, जो सोने, चांदी और कीमती रत्नों से सुसज्जित थे। नगरी के चारों ओर मजबूत दीवारें थीं और यह समुद्र के बीच द्वार (दरवाजे) की तरह दिखाई देती थी, इसलिए इसे द्वारका नाम दिया गया।
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गांधारी ने श्री कृष्ण को श्राप क्यों दिया
गांधारी द्वारा श्रीकृष्ण को श्राप देने की घटना महाभारत के अंत में घटित होती है। यह श्राप महाभारत युद्ध के बाद उनके दुख और क्रोध का परिणाम था।
श्राप देने का कारण
- कौरवों का विनाश:
- महाभारत के युद्ध में गांधारी के 100 पुत्रों का नाश हो गया।
- गांधारी अपने पुत्रों के विनाश और कौरव वंश के समाप्त होने के लिए श्रीकृष्ण को जिम्मेदार मानती थीं, क्योंकि उन्होंने युद्ध को रोकने के लिए अपनी पूरी शक्ति का उपयोग नहीं किया।
- युद्ध रोकने में असफलता:
- गांधारी ने महसूस किया कि श्रीकृष्ण, जो भगवान थे, महाभारत के युद्ध को रोक सकते थे।
- उन्होंने सोचा कि यदि श्रीकृष्ण चाहते, तो पांडव और कौरवों के बीच सुलह हो सकती थी और युद्ध टल सकता था।
- शोक और क्रोध:
- अपने पुत्रों और परिवार के विनाश से गांधारी अत्यंत दुखी और क्रोधित थीं।
- उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा कि उन्होंने अपनी दिव्य शक्ति का उपयोग करके युद्ध को टालने की बजाय इसे होने दिया।
- न्याय का प्रश्न:
- गांधारी ने युद्ध को अधर्म के रूप में देखा, जिसमें अधर्मियों के साथ-साथ धर्मी भी मारे गए।
- उन्होंने महसूस किया कि श्रीकृष्ण ने इसे होने दिया और पांडवों का साथ दिया।
श्राप का प्रभाव:
गांधारी ने श्रीकृष्ण को श्राप दिया:
- यादव वंश का विनाश:
“जैसे मेरे कौरव वंश का नाश हुआ, वैसे ही तुम्हारे यादव वंश का भी नाश होगा।” - द्वारका का अंत:
गांधारी ने कहा कि उनकी नगरी द्वारका भी नष्ट हो जाएगी और श्रीकृष्ण अकेले वन में अपने प्राण त्यागेंगे।
द्वारका नगरी को श्राप क्यों दिया?
द्वारका नगरी को श्राप मिलना भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण और उनके यादव वंश के विनाश से जुड़ी घटना है। द्वारका के नाश का श्राप मुख्य रूप से गांधारी द्वारा दिया गया था, और इसका कारण महाभारत युद्ध और उसके बाद की घटनाओं से जुड़ा है।
1. गांधारी का श्राप:
- महाभारत के युद्ध के बाद गांधारी ने अपने सौ पुत्रों (कौरवों) के नाश से आहत होकर श्रीकृष्ण को श्राप दिया।
- उन्होंने कहा, “जैसे मेरे वंश का नाश हुआ है, वैसे ही तुम्हारे यादव वंश का भी विनाश होगा, और द्वारका नगरी नष्ट हो जाएगी।”
- यह श्राप उनके दुख, क्रोध और श्रीकृष्ण को दोषी मानने का परिणाम था।
2. यादवों का अहंकार और अधर्म:
- महाभारत युद्ध के बाद यादव वंश बहुत शक्तिशाली हो गया और उनमें घमंड आ गया।
- श्रीकृष्ण के पुत्र सांब और अन्य यादवों ने ऋषि-मुनियों का अपमान किया।
- एक बार सांब ने ऋषियों के साथ मजाक करते हुए एक गर्भवती महिला का वेश धारण कर लिया और उनसे पूछा कि “इस गर्भ से क्या जन्मेगा?”
- क्रोधित ऋषियों ने उन्हें श्राप दिया, “तुम्हारे गर्भ से एक मूसल (लोहे का टुकड़ा) जन्मेगा, और यही यादव वंश के विनाश का कारण बनेगा।”
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3. यादव वंश का विनाश:
- ऋषियों के श्राप के बाद यादवों के बीच आपसी कलह और शराब पीने के बाद झगड़े शुरू हो गए।
- एक दिन द्वारका के यादव आपस में लड़ाई करते हुए मूसल के टुकड़ों से एक-दूसरे को मारने लगे।
- इस संघर्ष में पूरा यादव वंश नष्ट हो गया।
4. द्वारका का समुद्र में समा जाना:
- यादव वंश के विनाश के बाद श्रीकृष्ण ने द्वारका छोड़ दी।
- श्रीकृष्ण के स्वर्गारोहण के बाद द्वारका नगरी समुद्र में डूब गई। इसे भगवान की लीला और गांधारी के श्राप का परिणाम माना जाता है।
भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु कैसे हुई
भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु का वर्णन महाभारत, विशेष रूप से श्रीमद्भागवतम और अन्य पुराणों में मिलता है। उनकी मृत्यु एक अद्भुत और दुखद घटना थी, और यह उनके जीवन के अंतिम दिनों का हिस्सा थी। भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु के प्रमुख कारण और घटनाएँ निम्नलिखित हैं:
1. गांधारी का श्राप और यादवों का विनाश
भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु के पीछे गांधारी का श्राप भी एक महत्वपूर्ण कारण माना जाता है। महाभारत के युद्ध के बाद गांधारी ने श्री कृष्ण को यह श्राप दिया था कि जैसे उनके कौरव पुत्रों का नाश हुआ है, वैसे ही श्री कृष्ण के यादव वंश का भी विनाश होगा।
इस श्राप के बाद श्री कृष्ण के वंश में आपसी कलह और संघर्ष बढ़ गया, और यादवों में हिंसा की स्थिति उत्पन्न हुई। यादवों का अंत उनके आपसी संघर्ष और शराब पीने के बाद हुआ, जिससे श्री कृष्ण के परिवार का विनाश हुआ।
2. श्री कृष्ण का वनवास
यादवों के विनाश के बाद श्री कृष्ण ने द्वारका को छोड़ दिया और वन में जाने का निर्णय लिया। वह अकेले वन में गए और ध्यान और तपस्या में लीन हो गए। यह उनकी जीवन की अंतिम यात्रा थी, और उन्होंने महसूस किया कि उनका समय अब समाप्त हो चुका है।
3. श्री कृष्ण की मृत्यु का कारण
भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु के समय, जब वह ध्यान में बैठे थे, एक तीर (धनुष) के बाण ने उन्हें आ घेरा।यह बाण जरा, जो एक शिकार करने वाला था, द्वारा छोड़ा गया था। जरा को अपने शिकार पर ध्यान था, और उसने श्री कृष्ण को गलती से बाण मारा, जो उनके पैरों में लगा। यह बाण भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु का कारण बना, क्योंकि यह उनके शरीर में चुभने पर उनके जीवन के अंत का संकेत था।
श्री कृष्ण ने इसे भगवान की इच्छा और उनके द्वारा निर्धारित समय के रूप में स्वीकार किया।
4. श्री कृष्ण का स्वर्गारोहण
भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु के बाद उनके शरीर का नाश हुआ, और उन्होंने अपनी दिव्य शक्ति से स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया। इस समय उनकी अद्वितीय उपस्थिति और महानता को महसूस किया गया, और उन्होंने अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए धरती से विदा ली।
श्री कृष्ण का यह स्वर्गारोहण उनके जीवन के समापन का प्रतीक था, और इसे एक दिव्य लीला माना जाता है।
उनकी मृत्यु के साथ ही द्वारका का भी नाश हुआ, और उनके जीवन का उद्देश्य पूर्ण हुआ।
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बलराम ने अपने शरीर का क्यों त्याग दिया
बलराम का शरीर त्यागना एक धार्मिक निर्णय था। महाभारत और अन्य पुराणों के अनुसार, बलराम ने यह निर्णय लिया क्योंकि वह जानते थे कि श्री कृष्ण के साथ उनका समय अब समाप्त होने वाला है।
उनका शरीर त्यागने के समय उन्होंने तपस्या और योग के माध्यम से शारीरिक रूप में त्याग किया और वह श्वेत सागर में समाहित हो गए।
बलराम का शरीर त्यागने का समय यदुवंश के विनाश और द्वारका के अंत से मेल खाता है। उनके शरीर के त्याग के साथ ही यह संकेत दिया गया कि श्री कृष्ण और बलराम के कार्य समाप्त हो गए और अब वे दोनों भगवान के रूप में धरती से वापस लौटने वाले हैं।
बलराम के शरीर त्यागने के बाद श्री कृष्ण ने अपनी लीला पूरी की और स्वर्गारोहण किया।
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अंतिम शब्द
द्वारका नगरी न केवल भारतीय पौराणिक कथाओं का हिस्सा है, बल्कि इसके अस्तित्व के पुरातात्विक प्रमाण भी मिलते हैं। यह नगरी भगवान श्रीकृष्ण की अद्वितीय लीला, उनकी शासन व्यवस्था और उनके द्वारा किए गए धर्म स्थापना कार्यों का प्रतीक है। आज भी द्वारका अपने रहस्यमय इतिहास और धार्मिक महत्व के कारण श्रद्धालुओं और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
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